आज नई दिल्ली के जंतर मंतर पर देश भर में ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों के साथ मिलकर प्रगतिशील ताकतों ने मोदी सरकार द्वारा लाए गए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ फासीवादी संशोधन विधेयक पर जमकर आक्रोश जाहिर किया और इसे तुरंत वापस लेने की सरकार से मांग की।आज के प्रदर्शन में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के देश भर के विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर अखिल भारतीय क्रांतिकारी विद्यार्थी संगठन AIRSO के कॉमरेड निरंजन , मेघ व अन्य साथी तथा क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच RCF और जाति उन्मूलन आंदोलन CAM के अखिल भारतीय संयोजक कॉमरेड तुहिन ने भी एकजुटता प्रदर्शित किया।

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि 2019 के ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट में संशोधन करने की कोशिश पूरी तरह मनुस्मृति के उन आदेशों के अनुरूप है, जिसे आरएसएस अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानता है और जो महिलाओं तथा सभी उत्पीड़ितों को “अधम मानव” के रूप में देखती है। दरअसल, ट्रांसजेंडर लोगों के मौलिक अधिकारों को मान्यता देने वाला सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि “तीसरे लिंग” की पहचान “स्व-पहचान (self-identification)” के आधार पर की जानी चाहिए और इसके लिए किसी भी चिकित्सकीय प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होगी, 15 मार्च 2014 को आया था — ठीक दो महीने पहले, जब 26 मई 2014 को मोदी शासन सत्ता में आया। बाद में, व्यापक लोकतांत्रिक दबाव के चलते ही 2019 में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट अस्तित्व में आया, जो सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले की भावना के अनुरूप था।

वक्ताओं ने कहा कि मोदी शासन के सत्ता में आने के बाद से भारतीय समाज के हर क्षेत्र पर फासीवादी शिकंजा लगातार कसता गया है। केवल हिंदुत्व फासीवादी ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के फासीवादी ट्रांसजेंडर लोगों के विरोधी होते हैं, क्योंकि वे लैंगिक असमानता और गैर-अनुरूपता को अपने कठोर सामाजिक ढांचे के लिए खतरा मानते हैं, जो पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं और पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना पर आधारित होता है। ट्रांसजेंडर पहचान उस “जैविक अनिवार्यवाद (biological essentialism)” को चुनौती देती है, जिसका उपयोग फासीवादी विचारधारा समाज पर कड़ा नियंत्रण थोपने के लिए करती है।चूंकि फासीवाद पुरुष/महिला की सख्त द्विआधारी भूमिकाओं पर आधारित पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर करता है, इसलिए ट्रांसजेंडर पहचान को उसके “राष्ट्रवाद” (आरएसएस के मामले में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) के लिए खतरा माना जाता है। ऐसा इसलिए कि यह पारंपरिक पारिवारिक ढांचे को चुनौती देती है, जिसे फासीवादी एक “मजबूत राष्ट्र” के लिए आवश्यक मानते हैं। दरअसल, सभी फासीवादी “जेंडर थ्योरी”, जिसमें नारीवादी और ट्रांसजेंडर आंदोलन शामिल हैं, का विरोध करते हैं और इन्हें हमेशा “उदारवादी” तथा “वामपंथी” खतरों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। दूसरे शब्दों में, पूरी दुनिया में नव-उदारवादी फासीवादी (नव-फासीवादी), जो पितृसत्ता के मूल में खड़े हैं, ट्रांसजेंडर आंदोलनों को निशाना बनाते हैं और LGBTQ+ अधिकारों को फासीवादी शासन के लिए खतरे के रूप में पेश करते हैं।
वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज अमेरिकी फासीवाद का रूप ट्रम्पवाद इसका एक विशिष्ट उदाहरण है। ट्रम्प ट्रांसजेंडर लोगों के खिलाफ अमानवीय भाषा के प्रयोग के लिए कुख्यात हैं, जिनमें उन्हें समाज के लिए खतरे के रूप में चित्रित किया जाता है। उन्होंने पहले ही संघीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को तथाकथित “कट्टरपंथी जेंडर विचारधारा” की जांच करने का निर्देश दिया है और उसे अमेरिका के लिए खतरा बताया है। अब ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम के माध्यम से मोदी शासन, जो नीतिगत मामलों में ट्रम्प की नीतियों की नकल करता हुआ उसके पीछे चल रहा है, भारत में भी उसी दिशा में कदम बढ़ा रहा है। 13 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक, 2026 ट्रांसजेंडर पहचान को इस तरह पुनर्परिभाषित करता है कि उन्हें संवैधानिक संरक्षण से वंचित किया जा सके। यह “स्व-पहचान” की अवधारणा से हटाकर उन्हें एक कठोर “मेडिकल बोर्ड आधारित” पहचान प्रक्रिया के अधीन कर देता है। यह न केवल 2019 के कानून की भावना के विरुद्ध है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के उस फैसले के भी खिलाफ है, जिसने स्पष्ट रूप से स्व-पहचान को मान्यता दी थी और मेडिकल बोर्ड की आवश्यकता को खारिज कर दिया था।
यह कहना पर्याप्त है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सभी संगठनों और आंदोलनों, उत्पीड़ित वर्गों के संगठनों तथा सभी लोकतांत्रिक और संवेदनशील लोगों ने पहले ही इस बात को रेखांकित किया है कि ट्रांसजेंडर लोगों की पहचान में जबरन हस्तक्षेप करने का यह फासीवादी कदम उन्हें और अधिक हाशिए पर धकेलने तथा रोजगार और कल्याणकारी अधिकारों से वंचित करने की साजिश है। जबकि इस धुरदक्षिणपंथी और घृणित कदम का भौतिक उद्देश्य उन्हें कल्याण, सम्मान और रोजगार से वंचित करना है, इसकी वैचारिक नींव “जेंडर अनिवार्यवाद”, पितृसत्ता और “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” में निहित है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-निर्णय के अधिकार को ही नकार देता है।
प्रदर्शनकारियों ने तमाम लोकतांत्रिक और प्रगतिशील शक्तियों से अपील किया कि वे इस फासीवादी शासन की इस प्रतिक्रियावादी चाल के खिलाफ उठ खड़े हों और इस निर्णायक क्षण में ट्रांसजेंडर समुदाय के साथ एकजुटता प्रकट करें।
दिल्ली के जंतर मंतर से यह आह्वान दिया गया कि जो भी फासीवाद का विरोध करते हैं, उन्हें दृढ़ता के साथ इस ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक 2026 का विरोध करना चाहिए और मोदी सरकार से इसकी तत्काल वापसी की मांग करनी चाहिए। यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-निर्णय के अधिकार तथा गरिमा के साथ जीने के मौलिक अधिकार को छीनने की कोशिश है।
नई दिल्ली 29.03.2026
