नई दिल्ली,25 मार्च 2026। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है कि ईसाई और इस्लाम धर्म को मानने पर अनुसूचित जाति SC का दर्जा खत्म हो जाएगा।साथ ही आरक्षण और SC- ST उत्पीड़न कानून जैसे सुरक्षा प्रावधानों का लाभ भी नहीं मिलेगा।यह सब लाभ तभी मिलेगा जब वह व्यक्ति हिंदू,बौद्ध या सिख धर्म से संबंधित हो।
जाति उन्मूलन आंदोलन CAM की केंद्रीय कमिटी ने इस फैसले पर घोर आश्चर्य और चिंता व्यक्त किया।CAM का मानना है कि क्रूर मनुस्मृति आधारित अमानवीय जाति व्यवस्था का कहर भारत और नेपाल में पैठ जमाए हुए है।निश्चित रूप से सनातनी मनुवादी/ ब्राम्हणवादी धार्मिक व्यवस्था के तहत् देश की बहुमत शोषित- पीड़ित जनता हजारों सालों से बर्बर जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव झेलती आ रही है।सनातनी मनुवादी जाति व्यवस्था इतनी मजबूत और चौतरफा है कि कालांतर में भारत में और जितने भी धर्म पनपे उनमें एक विषाणु की तरह जाति व्यवस्था का जहर घुस गया।डॉक्टर अम्बेडकर ने बिल्कुल सही कहा था कि देश में कहीं पर भी खड़े हो वहां जाति व्यवस्था मुंह बाए खड़ी मिलती है।जाति है कि जाती नहीं।इसीलिए यह सिर्फ हिंदू सामाजिक ऐतिहासिक संरचना में ही नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन करने के बाद भी विद्यमान रहती है।और तो और भारत के ब्राम्हणवादी कुलीन वर्ग के लोगों के द्वारा अमरीका के सिलिकॉन वैली में जाकर वहां भी जातिवाद का प्रकोप इतना बढ़ा दिया गया है कि वहां की सरकार को जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून बनाना पड़ा।
दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कई दशकों से जारी है। इस उद्देश्य के लिए सरकार ने कई आयोगों का गठन किया है।
इनमें से एक महत्वपूर्ण आयोग, न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र आयोग (2007), ने सिफारिश की थी कि अनुसूचित जाति की स्थिति को धर्म से जोड़ना समाप्त किया जाना चाहिए। आयोग ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी दलितों को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए उन्हें अनुसूचित जाति का आरक्षण दिया जाना चाहिए। हालांकि, केंद्र सरकार इस रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।
भारतीय जाति व्यवस्था की कठोर प्रकृति के कारण, भले ही कोई व्यक्ति धर्म बदल सकता है, लेकिन जाति नहीं बदल सकता। इसलिए अनुसूचित जातियों को धर्म परिवर्तन के बाद भी भेदभाव, उत्पीड़न और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है।
इसलिए, धर्मांतरित अनुसूचित जातियों से उनका यह दर्जा छीन लेना सामाजिक न्याय का उल्लंघन है।
इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे क्योंकि फासिस्ट संघ परिवार,बौद्ध,सिख,जैन धर्मों को सनातनी हिंदू धर्म का हिस्सा मानता है। जबकि ऐसा है नहीं।साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि RSS के मार्गदर्शन में महाराष्ट्र,उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा राज्य सरकारों ने आम जनता के ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए धर्म परिवर्तन विधेयक पारित किया है।
जाति उन्मूलन आंदोलन की चिंता का सबब यह है कि संघी मनुवादी डबल इंजन सरकारों के राज में वैसे ही दलित उत्पीड़ित समुदाय की बदहाली व्याप्त थी अब इसके बाद उन पर उत्पीड़न और बढ़ेगा।
