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“भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद” विवाद पर अदालती फैसला: बाबरी मस्जिद फैसले की आपराधिक पुनरावृत्ति!

by Jayarajan C N

“भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद” विवाद पर अदालती फैसला: बाबरी मस्जिद फैसले की आपराधिक पुनरावृत्ति!

​मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का 15 मई का फैसला, कमाल मौला मस्जिद-भोजशाला परिसर को जबरन सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र घोषित करते हुए मुसलमानों को वहाँ से बेदखल कर वैकल्पिक भूमि खोजने का निर्देश देता है। यह फैसला कारपोरेट-फासीवादी सत्ता के घिनौने चरित्र को पूरी तरह बेनकाब करता है। विधानसभा चुनावों के ठीक बाद आया यह अदालती हमला साफ दिखाता है कि फासीवादी “डबल इंजन” सरकार मेहनतकश अवाम और अल्पसंख्यकों पर चौतरफा शिकंजा कसने के लिए न्यायपालिका का इस्तेमाल एक राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है।

​यह अदालती फैसला संसद द्वारा पारित 1991 के “पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम” का खुला उल्लंघन है, जो ऐतिहासिक धार्मिक विवादों को दोबारा खोलने पर कानूनी रोक लगाता है। शासक वर्ग के इस सांप्रदायिक एजेंडे को अमलीजामा पहनाते हुए, अदालत के फैसले के तुरंत बाद 16 मई को ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने दमनकारी आदेश जारी कर दिया। इसके तहत हिंदुओं को परिसर में “निर्बाध प्रवेश” सौंप दिया गया है और मुसलमानों द्वारा पीढ़ियों से अदा की जा रही “नमाज” पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई है।

​बाबरी मस्जिद के ही तर्ज पर, धार (मध्य प्रदेश) में कमाल मौला मस्जिद का विवाद 14वीं शताब्दी (लगभग 1310-1320 ई.) का है, जब यह धार सल्तनत के अधीन था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, तब से यह स्थल मुसलमानों की इबादत का निरंतर केंद्र और मालवा सल्तनत काल के सूफी संत शेख कमाल मौला की ऐतिहासिक दरगाह रहा है। लेकिन बाबरी मस्जिद की तरह ही, सांप्रदायिक हिंदू वर्चस्ववादी ताकतों ने इसे भोजशाला परिसर और सरस्वती मंदिर बताकर विवाद खड़ा किया। यह विवाद औपनिवेशिक शासकों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति की ही एक नतीजा है। वास्तव में “भोजशाला” शब्द का सुनियोजित प्रचार ब्रिटिश काल में 20वीं शताब्दी की शुरुआत में हुआ, जब 1903 में स्थानीय औपनिवेशिक शिक्षा अधिकारी द्वारा फर्श और स्तंभों पर संस्कृत श्लोकों की “खोज” का नाटक रचकर इसे सांप्रदायिक रंग दिया गया।

​इस साम्राज्यवादी-सांप्रदायिक साजिश के बावजूद, 1934 में धार रियासत के प्रशासनिक आदेश के तहत मुसलमानों ने भोजशाला परिसर में नियमित रूप से शुक्रवार की नमाज जारी रखी। लेकिन हिंदुत्ववादी फासीवादी दावों को खाद-पानी देते हुए, वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के अधीन ASI ने 7 अप्रैल 2003 को एक समझौतापरस्त व्यवस्था थोप दी, जिसके तहत हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी को पूजा की अनुमति दी गई, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा करते रहे। अब उच्च न्यायालय ने फासीवादी ताकतों के पक्ष में एकतरफा फैसला सुनाते हुए पूरे ऐतिहासिक स्थल को हिंदुओं को सौंप दिया है और परिसर के “वास्तविक धार्मिक चरित्र” को हिंदू घोषित कर मुस्लिम समुदाय को वहाँ से बेदखल करने की जमीन तैयार कर दी है।

​हिंदुत्ववादी ताकतें राज्य सत्ता के इस एकपक्षीय संरक्षण को “ऐतिहासिक और 700 वर्ष के संघर्ष का परिणाम” बताकर जश्न मना रही हैं। यह ठीक 7 नवंबर 2019 के सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले की याद दिलाता है, जिसने तमाम धर्मनिरपेक्ष दावों को दफन करते हुए संपूर्ण विवादित मस्जिद-मंदिर स्थल को राम मंदिर निर्माण के लिए सरकारी ट्रस्ट को सौंप दिया था।

​कमाल मौला मस्जिद का मामला बाबरी मस्जिद के ही आपराधिक पैटर्न की सीधी पुनरावृत्ति है। ठीक इसी तरह, दशकों के कानूनी विवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद, फरवरी 1986 में जिला अदालत के जरिए बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाए गए थे ताकि हिंदू समूहों को प्रवेश मिल सके। इसके बाद फासीवादी रथ यात्रा और राज्य के परोक्ष समर्थन से 1992 में मस्जिद को बर्बरतापूर्वक ध्वस्त कर दिया गया। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने उस ऐतिहासिक अन्याय पर कानूनी मुहर लगाई, जिसके परिणामस्वरूप कॉरपोरेट-फासीवादी गठजोड़ के नायक प्रधानमंत्री मोदी 2024 में स्वयं मुख्य “यजमान” बनकर उभरे।

​कमाल मौला मस्जिद पर यह हमला न तो अलग-थलग है और न ही अंतिम। “इतिहास के भगवाकरण” और फासीवादी एजेंडे के तहत वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही मस्जिद जैसी कई अन्य ऐतिहासिक इमारतें पहले से ही इस कॉरपोरेट-फासीवादी ताकतों की कतार में हैं। ​जब कार्यपालिका, विधायिका और यहाँ तक कि न्यायपालिका सहित राज्य सत्ता की तमाम संस्थाएँ पूरी तरह भगवाकरण का शिकार हो चुकी हैं, तब यह समझना जरूरी है कि अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों पर यह हमला कोई मामूली घटना नहीं है। यह उन्हें उनके राजनीतिक और नागरिक अधिकारों से वंचित कर ‘हिंदू राष्ट्र’ के दोयम दर्जे के नागरिक बनाने की बहुसंख्यकवादी फासीवादी मुहिम का हिस्सा है।

​यह बेहद निर्णायक और संघर्षपूर्ण समय है। देश की तमाम धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और साम्राज्यवादी-विरोधी व फासीवाद-विरोधी ताकतों को एकजुट होना होगा। हमें इस घृणित बहुसंख्यकवादी फासीवादी हमले के खिलाफ, जो देश को कारपोरेटपरस्त मनुवादी हिंदू राष्ट्र की ओर धकेल रहा है, सड़कों पर उतरकर निर्णायक और अथक प्रतिरोध संगठित करना होगा।

​पी. जे. जेम्स
महासचिव
भाकपा (माले) रेड स्टार
​नई दिल्ली
17.05.2026

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